आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: किसे बदलना चाहिए और किसे नहीं?

Blog-19

प्रश्न: क्या बदलाव सही है और क्या गलत?

आचार्य प्रशांत: सही गलत का सवाल नहीं उठता, बदलाव है, जो हो ही उसपर सही गलत का ठप्पा नहीं लगाना चाहिए, बदलाव जीवन है, हम सब समय में जीते हैं, और समय का अर्थ ही है बदलना।

प्र: लेकिन मैं यह जानना चाहता हूँ कि हम खुद को परिस्थिति के हिसाब से बदलते हैं तो क्या यह सही है?

आचार्य जी: अब यह सवाल का दूसरा भाग हुआ, पहला तो यह कि बदलाव है, और दूसरा यह कि क्या बदलाव उचित है?

तो बदलाव तो है, और बिलकुल सामने है, उसको नकारने की कोशिश फ़ालतू है, तुम प्रतिपल बदल रहे हो, समय का अर्थ ही है बदलना, समय में जो कुछ है, सब बदलेगा, तुम किसी भो तरीके से उसको रोक नहीं सकते, बिलकुल रोक नहीं सकते।

दूसरी बात यह कि ‘क्या यह बदलाव उचित है?’

जिसको बदलना चाहिए वो ही बदले, जिसको नहीं बदलना चाहिए वो बिलकुल न-बदले।

जो बाहरी है, बदलना उसकी प्रकृति है, और वो बदलेगा, बहुत अच्छी बात है कि बदले, उसके बदलने के रास्ते में रोड़े मत अटकाना, और कुछ तुम्हारे भीतर ऐसा है, जो बदल सकता ही नहीं, उसको कोशिश भी न करना की बदल जाए।

पर हम जीवन बिलकुल उलटे तरह से जीते हैं, जो कुछ बदलेगा उसको हम रोकने की कोशिश करते हैं कि काश यह न बदले, और वो जो स्थिर है, शाश्वत है, उसका हमें कुछ पता होता नहीं, बाहरी चीजें, जैसे तुम्हारे आसपास जो लोग हैं, तुम्हारे रूपए-पैसे इन सब को तुम कोशिश करते हो कि यह कभी न जाएं, यह कभी न बदलें, आज जैसा है सदा वैसा रहे, जबकी यह पक्का है कि यह बदल जाना है।

शरीर है, इसको तुम चाहते हो कि आज जैसा है, बना रहे ऐसा ही, क्योंकि यह भी पक्का है कि यह बूढ़ा होगा, मर जायेगा, बदलेगा, जहाँ तुम्हें यह विचार करना ही नहीं चाहिए कि कुछ न बदले वहाँ पर भी तुम बदलाव को रोकने की कोशिश करते हो जो की पागलपन है, क्योंकि तुम्हारे कोशिश करने से कुछ होगा नहीं, बदलना उसकी प्रकृति है, वो बदलता रहेगा।

दूसरी तरफ, तुम्हारा जो दूसरा सिरा है, वो एक ऐसे आयाम में है, जो समय के पार है, हमनें कहा जो कुछ समय में है वो बदलेगा, तुम दो आयामों में होते हो, एक तो वो जो लगातार बदल ही रहा है, जो समय है, आकाश है, पदार्थ है।

और दूसरी वो जो कभी बदल सकती नहीं, जो समय के पार है, उस आयाम का तुम्हें कुछ पता नहीं, उसका बिलकुल होश नहीं, चूँकि उसका होश नहीं है इसलिए तुम स्थिरता को वहाँ खोजने की कोशिश करते हो जहाँ कोई स्थिरता हो नहीं सकती, क्योंकि असली स्थिरता से बिलकुल अनभिज्ञ हो।

इसलिए उसको गलत जगहों पर तलाशते हो जहाँ वो तुम्हें मिलेगा नहीं।

तुमने देखा है न, हम सब कैसे स्थितियों को बाँध के रख लेना चाहते हैं, कोई तुम्हारा स्वजन है, प्यारा है, तुम चाहते हो कि कभी दूर न हो, बदले न, है आज मेरे पास, हमेशा मेरे पास रहे, तुम्हारे सुख के क्षण होते हैं, तुम चाहते हो कि कभी जाएं न, जैसे आज है वैसे ही रहे। हम सब को तलाश है उसकी जो कभी बदले न पर हम उसको गलत जगह खोज रहे हैं। हम उसको जिस जगह खोज रहे हैं वहाँ वो हमें कभी नहीं मिलेगा। वो हमें वहाँ कभी नहीं मिलेगा, पर हाँ तुम्हें तलाश है इस कारण यह स्पष्ट है कि उसको पाना ज़रूरी है तुम्हारे लिए।

उसको पाना तुम्हारे लिए ज़रूरी न होता तो तुम उसकी इस तरह से तलाश नहीं करते कि कुछ तो ऐसा मिल जाये जो बदलता न हो, कुछ तो ऐसा मिल जाए जो पूरी तरह मेरा हो, जिसे कोई छीन न सकता हो, कुछ तो ऐसा मिल जाए जो समय से बाहर हो कि समय बदलता रहेगा तो भी वो नहीं बदलेगा, तलाश हम उसी की करते हैं, पर हम उसकी जिस जगह तलाश करते हैं वहाँ वो मिलेगा नहीं।

तो बदलाव उचित है, पूरी तरह से उचित है, बाहर-बाहर। और बदलाव हो ही नहीं सकता जहाँ पर तुम हो, तुम्हारे केंद्र में, जो कुछ बदल नहीं सकता उसका नाम है ध्यान, वो सारे बदलाव को बस जानता है, वो खुद नहीं बदलता, उसी का नाम है ध्यान, उसी का नाम है चेतना, वो बस जानता है कि क्या-क्या बदल रहा है, ‘अच्छा! सब बदल रहा है’, पर वो नहीं बदल रहा।

तो क्या बदल सकता है, क्या परिवर्तनीय है, और क्या नहीं है परिवर्तनीय, इन दोनों को अलग-अलग जानो, और इनको आपस में मिलाओ मत, जहाँ परिवर्तन होना ही चाहिए, वहाँ उसे पूरी तरह होने दो, और खेलो उसके साथ, और रोकने की कोशिश भी मत करो, कह दो कि यह सब तो बदलना ही था, बदल गया, अब इसमें रोना कैसा जो जाना ही है उसको मुट्ठी में बाँधने की कोशिश कैसी, तो उसको बदलने दो, बिलकुल उसमें तुम रोड़ा मत अटकाओ कि मैं बदलने नहीं दूँगा।

तुम कितनी देर तक रोकलोगे?

तुम्हारे बस की नहीं है!

हाँ, जो बदल नहीं सकता उसको जान लो, अब तुम्हारे पास दोनों हैं।

और जिस के पास होंगे, वो दोनों ही होंगे, एक नहीं होगा, वो फिर दोनों का मालिक हो जायेगा और बहुत मजेदार हालत हो जाएगी उसकी।


शब्द-योग सत्र से उद्धरण। स्पष्टता के लिए सम्पादित।

संवाद देखें : आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: किसे बदलना चाहिए और किसे नहीं?


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आचार्य प्रशांत जी की पुस्तकें व अन्य बोध-सामग्री देखने के लिए:

http://studiozero.prashantadvait.com/

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