आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: नयी दुनिया और पुराने तरीक़े

आचार्य प्रशांत: मैं आशा करता हूँ कि हम सभी को उत्कृष्टता की चाह है। यह मेरी कल्पना है, आशा है कि मैं गलत नहीं हूँ। क्या मैं गलत हूँ? हम में से कितने हैं, जो उत्कृष्टता नहीं चाहते?

देखिये, होता क्या है कि जिस तरीके से हम बड़े होते हैं, जैसी हमारी शिक्षा प्रणाली है, जैसा हमारा वातावरण है, हमें ये विश्वास दिला दिया जाता है कि हम जिस भी तरीके को इस्तेमाल करें, परिणाम बढ़िया ही होगा। और हमारे आस पास काफ़ी उदाहरण हैं, जो इसी बात की तरफ इशारा करते हैं। जब इतने उदाहरण हैं जो इसी की तरफ इशारा करते हैं, हमें ये भुलावा हो सकता है कि कुछ भी कर के अच्छे परिणाम पाए जा सकते हैं।

आपने क्या देखा है अब तक? आप में से बहुत होंगे जो उत्तर-प्रदेश बोर्ड से होंगे? और आप लोगों ने उत्तर-प्रदेश शिक्षा व्यवस्था में, पिछले पंद्रह सालों में सबसे खराब समय देखा है। जहाँ सिलसिलेवार बदलती सरकारों ने नक़ल करना वैध माना। और मेरा ख़्याल है कि आप में से कुछ लोगों ने कुछ परीक्षा-केंद्रों में ऐसा देखा होगा, जहाँ सरकारों ने नक़ल करने को पूर्णतया वैधानिक करार कर दिया था? देखा है आपने? धड़ल्ले से नक़ल चल रही होती है। ताकि ज़्यादा से ज़्यादा छात्र उत्तीर्ण हो सकें, पास-परसेंटेज बढ़ सकें। और आप सब को पता है कि मैं किस तरफ इशारा कर रहा हूँ! मैं उन शिक्षा-मंत्रियों के नाम नहीं ले रहा हूँ, पर हम सभी जानते हैं कि हम क्या बात कर रहे हैं? हमने वो सब देखा है! और हम सब तब बच्चे थे। ये दसवीं और बाहरवीं के बोर्ड परीक्षा में होता था ज़्यादा। हम सभी तब बच्चे थे! और हमें क्या सन्देश मिला? फ़र्क क्या पड़ता है? जिसने कुछ भी नहीं पढ़ा, पहली डिवीज़न तो उसकी भी आ गयी। सही?

फिर हम आते हैं, दाखिले के चरण में! और हम क्या देखते हैं? हम देखते हैं कि एक लाख से भी ज़्यादा प्रत्याशियों  में से, जो उत्तर-प्रदेश टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से पढ़े हैं, केवल कुछ ही हैं, जो काउंसलिंग के ज़रिये दाखिल किये जाते हैं। और यू.पी.टी.यू. के सारे कॉलेजों की सीट्स कैसे भरी जाती हैं? हमने क्या देखा? हमारा क्या अनुभव रहा?

हमने देखा कि फ़र्क़ ही नहीं पड़ता कि उनकी कोई रैंक आयी भी है या नहीं आयी है! हमने देखा, कि कॉलेज ही प्रत्याशियों के पीछे जा जा के सीट्स भर लेते हैं। फ़र्क ही नहीं पड़ता की आपकी मेरिट क्या है! जब मैं अपनी बी.टेक कर रहा था, कंप्यूटर-विज्ञान की ‘एक’ सीट भी बहुत बहुमूल्य होती थी। बहुत ही बहुमूल्य। और आपका अनुभव क्या रहा है? क्या देखा आपने चारों ओर? कि कंप्यूटर-विज्ञान की सीट्स तो बँट रही हैं! यही देखा ना आपने?

उसके बाद ये चार साल का दरमियान शुरू हुआ, बी.टेक का! और उसमें आपने क्या देखा? उसमें आपको पता चला कि फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मैं किसी चीज़ को गहराई से समझता हूँ, या नहीं। “क्वांटम” ज़िंदाबाद!

(छात्र हँसते हैं)

और आपने ये देखा कि आपकी कक्षा में, बैच में, सेक्शन में, बहुत सारे ऐसे विद्यार्थी हैं, जिन्हें अक़सर कुछ समझ में नहीं आता है। उनको बस अभियांत्रिकी(इंजीनियरिंग) के नाम-मात्र विद्यार्थी ही कहा जा सकता है। पर पता नहीं कैसे, जब परिणाम आते हैं, उनके अंक बहुत ही अच्छे आते हैं! औसत (एवरेज) से भी ज़्यादा! देखें हैं ऐसे छात्र? आपने ये भी देखा कि कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कौन कितनी अटेंडेंस दे रहा है। कौन क्लास अटेंड करता है, और कौन नहीं करता है। जो बहुत अटेंड कर रहे होते हैं, आपने देखा है कि अक़सर वो साठ-पैंसठ प्रतिशत के लिए भी हाथ-पैर मार रहे होते हैं। और आपने देखा, कि जो नहीं अटेंड करते हैं, वो अक़सर पैंसठ, सत्तर, पिचहत्तर प्रतिशत भी ले आते हैं। देखा है कभी ये?

 छात्र: जी, आचार्य जी।

आचार्य जी: और ये जो सब हम लगातार देखते आ रहे हैं, उसने हमको मनवा दिया है कि परिणाम और परिणाम तक पहुँचने के ज़रिये, आपस में संबंधित नहीं हैं। हमको गलती से, ये सोचने पर विवश कर दिया गया है, कि परिणाम और परिणाम तक पहुँचने के तरीके, ज़रिये, आपस में जुड़े हुए नहीं हैं (एंड्स आर फ्री ऑफ़ द मीन्स)। एंड्स क्या होता है? जिस लक्ष्य या टारगेट कहते हैं और मीन्स  क्या होता है? जो आपके तरीके होते हैं। आपने अभी तक क्या देखा है? कि चालाकी से परिणाम तक पहुँचा जा सकता है। ठीक है ना? यही देखा है ना आपने?

मैं आपको दोषी नहीं ठहराता। अगर आप सब ने ये ‘देखा’ है, होते हुए, कम-से-कम आप लोग तो नहीं थे, ये सब करने वाले। ऐसा तो था ही, चारों ओर की व्यवस्था में। आप तो छोटे थे, आपने बस देखा! देखा और सीख लिया। लेकिन, अब आप किशोर नहीं हो। आप अभी एक पुल पर खड़े हैं, आप सभी! और वो पुल है किसके बीच में? एक तरफ है वो ज़िन्दगी, जो आप सभी ने अब तक जी है, और पुल के दूसरी तरफ है वो ज़िन्दगी, जो अभी आप शुरू करेंगे! तो यह पुल है, आपके भूत और भविष्य के बीच में। आपका अतीत, आपका गुजरा समय, आपको संकेत देता है कि कुछ भी चलता है! कुछ भी कर के, किसी भी तरीके से!

हम में से कितने हैं, जो उत्तर-प्रदेश से हैं?

(छात्र अपने हाथ उठाते हैं)

और आप में से कितनों को लगता है, कि कुछ सालों में, आप उत्तर-प्रदेश में ही कार्यरत होंगे?

ये देखिये! क्या आप देख सकते हैं, कि आपके अतीत और भविष्य में कितना अंतर है? पहले तो इस बात पर गौर कीजिये, कि “मानव-विकास” के क्षेत्र में, भारत बहुत ही पिछड़ा हुआ है। भारत की “एच.डी.आई.” रैंक आती है, १३० के आस-पास। दुनिया के १८०/२०० मुल्कों में से। अफ्रीका तक के बहुत सारे मुल्क हमसे आगे हैं। और हिंदुस्तान में भी, जो बीमारी राज्य कहे जाते हैं, उनमें, जो महा-बीमार राज्य है, वो है पूर्वी उत्तर-प्रदेश। और हम में से बहुत सारे लोग पूर्वी उत्तर-प्रदेश से हैं। क्या मैं सही हूँ?

तो, जो आप सब ने देखा है, और आप जहाँ से आ रहे हैं, वो उधर का संकेत नहीं देता जिधर को आप जा रहे हैं। आपको क्या लगता है कि आप किन-किन जगहों पर कार्यरत होंगे? आज से दो साल बाद। सिर्फ, कल्पना कीजिये।

श्रोता: बैंगलोर।

आचार्य जी: किसी ने कहा, बैंगलोर! बिलकुल सही बात है। अगर यहाँ कंप्यूटर-विज्ञान के बच्चे बैठे हैं, तो आपको पता ही है, कि भारत में तकनीकी का गढ़ कहाँ पर है। अब बैंगलोर, बदायूँ नहीं है! और लॉस-एंजेलेस, लखीमपुर-खीरी नहीं है!

(छात्र हँसते हैं)

लेकिन, हम ये सोच रहे हैं, कि हम अपनी वही मानसिकता ले कर के, जो हम प्रतापगढ़ से, और बदायूँ से, और बलिया से, ले कर के आये हैं, ये पुल पार कर जाएँगे। और एक सुन्दर भविष्य भी बना लेंगे। हमने ये सोच लिया है कि हम अपनी वही मानसिकता ले कर के एक अलग भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। अगर आप वैसे ही रहोगे, जैसे आप हो, और जैसा आपको आपके अतीत ने बना दिया है, तो भविष्य क्या अलग हो सकता है? भविष्य क्या अलग हो सकता है? नहीं हो सकता है।

मैं जो कुछ भी कह रहा हूँ, वो आपके अभी की स्थिति, जिस से आप गुजर रहे हैं, बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये जो आपकी वर्कशॉप्स लगातार चलती रहती हैं, और इसमें आप जो कुछ भी कर रहे हैं। ये मैं जो कुछ भी बोल रहा हूँ, ये सारे अवलोकन वहाँ से ही आ रहे हैं। और आप जिधर को जा रहे हैं, ये सारे अवलोकन वहाँ के लिए ही प्रासंगिक हैं। तो इसको ज़रा समझिये।

ज़रा इस बात पर गौर कीजिये कि आप अपने अतीत के अनुभवों का बोझ उठा कर चल रहे हैं। और आप सोच ये रहे हैं, कि उसी प्रकार के अनुभव, जिन्होंने आपको ये नज़रिया दिया है, एक तरीके की मानसिकता प्रदान करीे है; वही अनुभव, वही मानसिकता, आपकी एक नया भविष्य बनाने में आपकी मदद कर सकते हैं। आप गलत हैं। ऐसा नहीं होगा, ऐसा ना कभी हुआ है, और ना हो सकता है। यह तो अस्तित्व के कानूनों के भी विरुद्ध है। ऐसा हो नहीं सकता।

मैं आपको कुछ उदाहरण देता हूँ, अगर आप स्पष्ट ना समझ पा रहे हों, कि मैं क्या कह रहा हूँ।

मैंने आपको बताया कि आपने अभी तक देखा कि शैक्षिक सफलता किन चीज़ों से आती है। आपने देखा कि शैक्षिक सफलता तो इस बात से प्रभावित होती ही नहीं है, कि कौन कक्षा में उपस्थित है, कौन कितना ईमानदार लगता है, तमाम बेतरतीब कारणों के चलते किसी के अच्छे अंक आ सकते हैं। ये देखा है ना आपने? आपने देखा है, कि फ़र्क ही नहीं पड़ता कि मैंने इंटरनल्स में कैसा किया। फ़र्क ही नहीं पड़ता कि मैंने लैब्स में कैसा प्रदर्शन किया।

आपने देखा है, कि कोई कुछ भी कर ले, इंटरनल्स में उसको कम-से-कम कितने प्रतिशत अंक मिल ही जाने हैं? कितने मिल जाते हैं? साठ, सत्तर, अस्सी! मैंने नब्बे प्रतिशत तक आते देखे हैं लोगों के, इंटरनल्स में। विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में, आपने देखा, आपका अनुभव ये रहा है – आपने देखा कि उसी प्रत्याशी के विश्वविद्यालय की परीक्षा में तीस- चालीस प्रतिशत अंक आ रहे होंगे, लेकिन इंटरनल्स में उसके अस्सी प्रतिशत रखे होते हैं। और आपको लगता है कि ठीक है, चलता है, दुनिया ऐसी ही है। और ऐसा कर के सफलता मिल सकती है।

जो कुछ आपने देखा, वो अब ख़त्म होता है। वो अब ख़त्म होता है, क्योंकि आपका इतिहास अब ख़त्म होता है। जैसा कि मैंने कहा, अब आप एक पुल पर खड़े हैं। आपने जो कुछ भी देखा, वो सब अब पीछे छूटेगा। लेकिन आप इस बात को पूरी तरह देख नहीं रहे हैं, और स्वीकार नहीं कर रहे हैं, कि उस सब को अब पीछे छूटना ही है, वो पीछे छूटना चाहिए। आप अपने पुराने तौर-तरीकों को ही आगे बढ़ाने में बहुत उत्सुक हैं। चलते रहे, मेरे पुराने तौर-तरीके ही।

आपको पता है? टी.सी. एस. ने पिछले साल, कितने प्रत्याशियों को नौकरी दी, पूरे भारत में? है कोई ज्ञान, इस बारे में?

श्रोता: पचास हज़ार।

आचार्य जी: हाँ, पचास हज़ार से बहुत ज़्यादा। और इनमें से कितने प्रतिशत उत्तर-भारतीय राज्यों से आया था?

श्रोता: पच्चीस।

आचार्य जी: हाँ, आप बहुत करीब हैं। करीब पच्चीस प्रतिशत।

उत्तर-भारतीय राज्यों की आबादी का, भारतवर्ष की कुल आबादी में कितना योगदान है? भारत की पूरी जनसंख्या में से, उत्तर-भारतीय राज्यों का कितना अनुपात है?

श्रोता: पचास।

आचार्य जी: सिर्फ पचास?

श्रोता: सत्तर।

आचार्य जी: पैंसठ प्रतिशत से ज़्यादा! केवल उत्तर-प्रदेश की ही आबादी, जल्द ही बीस करोड़ छूने वाली है। इस बात पे ध्यान दीजियेगा, क्योंकि मैं उत्तर आप ही से पूछने वाला हूँ – जिन राज्यों से आबादी का दो-तिहाई आता है, उन राज्यों से नए प्रत्याशी, सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में, या कहीं भी, सिर्फ एक-चौथाई ही क्यों चुने जाते हैं?

दक्षिण-भारत में ऐसी बहुत सी जगहें हैं, जहाँ अगर ‘टी.सी.एस.’ या ‘इनफ़ोसिस’ कम्पनियाँ जाएँ, तो वहाँ से वो आराम से आठ-सौ से हज़ार तक नए प्रत्याशियों को चुन लें! लेकिन ऐसा उत्तर-भारत में शायद ही कभी हो! क्यों?

क्या वो लोग कुछ ख़ास हैं, जो नर्मदा नदी के दक्षिण की तरफ रहते हैं? क्या वे बेहतर ‘सी प्लस प्लस’ कौशल के साथ ही पैदा होते हैं? वो रसम में ‘जावा’ मिला के पीते हैं? ऐसा तो कुछ नहीं है! बात जो है, वो नज़रिए की है! बात, संस्कारों की है।

हमें यही दिखा-दिखा के पाला गया है, कि कुछ भी चलता है। कुछ भी चलता है, कैसे भी कर के! सफलता मिल जाती है। और यही कारण है, कि हम बुरी तरह से असफल हैं। क्योंकि हमारी ज़िन्दगी का, जो हमने आधार बना रखा है, जिस बुनियाद पर हमने ज़िन्दगी खड़ी कर रखी है, वो गलत है। हमने सोचा है, कि आप रास्ता क्या चुनते हैं, उससे फ़र्क नहीं पड़ता। सिर्फ परिणाम ही देखा जाता है। और इसका परिणाम ये है, कि हमारे परिणाम बहुत ही खराब आते हैं।

अब मैं मुद्दे की बात पर आता हूँ।

आप से लगातार मेरे को ये सुनने को मिले, कि हमको सीधे-सीधे उत्तर नहीं बताये जाते हैं, साक्षात्कार के प्रश्नों के। और यह ऐसी प्रतिक्रिया है, जो कि मैंने कम-से-कम दस बार, दस अलग-अलग प्रत्याशियों से सुनी है – कि हमें क्यों सीधे, सरल उत्तर क्यों नहीं थमाए जाते, जो कि हम सीधे वास्तविक साक्षात्कार में जा कर के उगल दें, दोहरा दें। एक और प्रतिक्रिया जो मैंने सुनी है, कि भिन्न-भिन्न साक्षात्कारों में मुझे अलग- अलग प्रतिक्रिया सुनने को मिली है। तो, क्या करूँ? मुझे समझ में नहीं आता! मुझे कोई एक स्पष्ट प्रतिक्रया दे दीजिये।

क्या आप देख रहे हैं, कि हमारे गुज़रे समय का, हमारे अतीत का, बस एक छोटा सा हिस्सा है। एक स्वछंद दिमाग, एक वास्तविक इंजीनियर का दिमाग तैयार होता है, कैसी भी, अव्यवस्थित परिस्थितियों का सामना करने के लिए। और पूरी सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री भी इसी पर बनी है।

बहुत कुछ होता है किसी भी सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट में, जो अव्यवस्थित होता है, असंरचित होता है। जिसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं होता। और उसी से पार पाना, उस प्रोजेक्ट की सफलता निर्धारित करता है। परन्तु, चूँकि हमें एक ही तरीके से प्रशिक्षित किये गए हैं, हम सिर्फ एक ही उत्तर की तलाश में रहते हैं, जिसे हम रट लें और साक्षात्कार में उगल दें। मुझे बता दीजिये कि मुझे क्या बोलना है, जब मुझसे पूछा जाए कि, कृपया अपने बारे में कुछ बतायें, तो मुझे क्या कहना है! मुझे एक चीज़ बता दीजिये ना, मैं उसकी दस-बारह बार रिहर्सल कर लूंगा, और फिर मैं वही जा कर वहाँ दोहरा दूँगा। क्योंकि यही तो मैंने आज तक करा है! यही कर-कर के तो मैंने बोर्ड की परीक्षा पास करी है। यही कर के बाहरवी पास करी, यही कर के तो मैंने अभी तक बी. टेक निकाली है। तो मुझे ये लग रहा है, कि यही कर के, मैं भविष्य में भी सफलता पा सकता हूँ! नहीं, वो कहानी अब ख़त्म हुई। भविष्य बहुत अलग है।

भविष्य बहुत अलग है!

कोई भी संगठन, चाहे वो सॉफ्टवेयर का हो, या हार्डवेयर का हो, या कुछ भी हो, ऐसे लोग नहीं रखना चाहता जो दोहराने में यकीन करते हैं। मुझे अगर दुहरवाना ही है, तो उसके लिए बहुत सारी रेकॉडिंग पद्धतियाँ हैं। मैं रिकॉर्ड कर लूँगा और फिर जितनी बार चाहूँगा, दोहराता रहूँगा।

अगर मैं हायरिंग कर रहा हूँ, और मैं आपको अपने अनुभव से बताता हूँ – बहुत सारे देश के नामी एम्. बी. ए. प्रोग्राम्स हैं, उनके पैनल में भी बैठ चुका हूँ! अपनी कंपनी के लिए भी हायरिंग करते ही हैं। सबसे पहले, कोई भी रिक्रूटर (भर्ती-कर्ता), जिस आदमी को ना करना चाहता है, वो, वो आदमी है जो रट के आया है। सबसे पहले जिस आदमी को मैं नापसंद करूँगा, वो, वो आदमी है, जो मुझे दिख रहा है, जो नकली है। सबसे पहले मैं उसको हटाऊंगा, जिसको मुझे दिखेगा की जो मेरा सवाल नहीं समझ रहा है, उसको आपने उत्तर देने में ज़्यादा रूचि है। पर आप वही प्रत्याशी बन जाना चाहते हैं, जो सबसे पहले नकारा जायेगा।

क्यों?

क्योंकि इतने सालों की, पिछले बीस-बाईस सालों के संस्कारों ने आप को बहुत डरा दिया है। आपको वास्तविक होने से, असली होने से डर लगने लग गया है। आपको किसी भी स्थिति में, एक कवच चाहिए। जो आपकी सुरक्षा कर सके। निर्भय हो कर खड़ा होना, कि यहाँ, ये हूँ मैं, आश्वस्त और सुरक्षित

और मैं स्वतः ही, सहजतापूर्ण आपके प्रश्नों के उचित उत्तर देने का समर्थ रखता हूँ, वो आपने बिलकुल भुला दिया है।

याद रखियेगा, खो नहीं दिया, सिर्फ भुला दिया है। जब चाहेंगे, दोबारा याद आ जायेगा।

यह हमारी व्यवस्था का दोष है, कि अभी तक उसने हमको बहुत गलत किस्म के सन्देश दिए हैं। पर अब वो व्यवस्था ख़त्म होती है, आप एक नयी दुनिया में जा रहे हैं। यहाँ पर पुरानी व्यवस्था के नियम क़ायदे नहीं चलेंगे।

चलिए, मैं आपको साक्षात्कारों के विषय में कुछ बताता हूँ। इसके बाद में ‘एप्टीटुड’(योग्यता) का विषय लूँगा, उसके बारे में भी बात करेंगे। क्योंकि उसमें भी बहुत कुछ है, जिस पर बात की जानी चाहिए।

आप साक्षात्कारों के विषय में क्या जानना चाहते हैं? क्या रटना चाहते हैं? आपको पता है, इंटरव्यू-रूम में घुसने से ले कर के बाहर जाने तक आप कितनी गतिविधियाँ करते हैं, अलग-अलग? आप में से कोई है जो कल्पना करना चाहेगा, कि आप कितनी गतिविधियाँ करते हैं, जिस पर साक्षात्कार लेने वाले की नज़र जा सकती है, और जो आपके साक्षात्कार के परिणाम को प्रभावित कर सकती है? हाँ, कोई अनुमान लगाना चाहेगा?

श्रोतागण: बीस, पंद्रह, दस-पंद्रह, तीस से ज़्यादा!

आचार्य जी: आप वास्तविकता को बहुत ही कम आंक रहे हैं। हर एक चीज़ देखी जाती है, एक एक चीज़ की समीक्षा साक्षात्कारकर्ता सूक्ष्मता से कर रहा होता है। क्योंकि यही काम है उनका, पूरे पूरे दिन! आप जैसे लोगों का साक्षात्कार बनाना, उनका आकलन करना, यही तो उनकी ज़िम्मेदारी है, यही वो दिन रात करते हैं। आप दरवाज़ा खड़काते हो, तो आप कैसे खड़काते हो? आप के कदम कितने सधे हुए हैं, और कितने नहीं सधे हुए हैं! आप रुक के आ रहे हो, नहीं रुक के आ रहे हो। आपके चेहरे पर पसीना है, या नहीं है! आप आते हो, तो सामने तीन कुर्सियाँ रखी हैं, तो उसमें से किस कुर्सी पर बैठने की कोशिश करते हो! अनगिनत ऐसी चीज़ें हैं, जिन पर ध्यान दिया जा रहा है, और आप को पता भी नहीं है।

और अभी हमने ये बात तो शुरू भी नहीं करी कि उनके सवालों का उत्तर कैसे देते हो। क्योंकि एक-एक सवाल में से हज़ार-हज़ार उत्तर फूटते हैं। और हर उत्तर में से, हज़ार और सवाल फूटते हैं। पहली बात तो ये, कि क्या आप देख रहे हैं, कि कितनी ही गतिविधियाँ हो रही हैं, एक इंटरव्यू-रूम में? क्या आप सच में रट सकते हैं, कि इन सब परिस्थितियों में आपकी कैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए? क्या ये रटाया जा सकता है? उदाहरण के लिए, आप एक इंटरव्यू-रूम में आते हो। आपको हमने इस बात का उत्तर रटा भी दिया, कि ‘अपने बारे में बतायें’, या ‘आपकी क्षमताएँ और कमज़ोरियाँ क्या हैं’, आप हमेशा इन्हीं प्रश्नों का उत्तर मांगते रहते हैं। कि सर, मैम, इसमें क्या बोलूँ, बता दीजिये!

मैं साक्षात्कारकर्ता हूँ, बैठा हूँ, और शाम के साढ़े-पाँच बज रहे हैं। दिल्ली से मेरी आठ बजे की उड़ान है, और मुझे पता है कि एक घंटा पहले मुझे विमानपत्तन पहुँचना है, और ये भी पता है कि इस समय पर ट्रैफिक का क्या हाल होगा। तो मैं साक्षात्कार ऐसे ले रहा हूँ, जल्दी-जल्दी ‘सी.वी’ हटा रहा हूँ, और मुझे पता है अभी पाँच प्रत्याशी और बाकी हैं। तो मैं पूछता हूँ, ‘अपने बारे में कुछ बताईये’, एक स्थिति। दूसरी स्थिति, तीन साक्षात्कारकर्ता हैं, और तीन मज़े में बैठ कर चाय पी रहे हैं, पीछे टिके हुए हैं कुर्सी में। और आप अंदर आते हो, और आपसे कहते हैं, कहिये प्रकाश, ‘चलिए बताईये, कुछ अपने विषय में’। तीसरी स्थिति, एक ही साक्षात्कारकर्ता है, आप जब अंदर आते हैं, यहाँ आपको बैठना है, ये उसकी कुर्सी है, और पीछे एक खिड़की है, और वो मोबाइल ले कर के पीछे खड़ा हुआ है। और उसमें कुछ वो लिख रहा है, और आप जब अंदर आते हैं, तो वो कहता है, आईये-आईये बैठिए, ‘अपने बारे में कुछ बतायें’। एक चौथी स्थिति है, अभी-अभी साक्षात्कारकर्ता को उसके प्रबंधकर्ता का फ़ोन आया है, और उससे उसने जम के झाड़ खायी है। और आप अंदर घुसते हैं, वो बोलता है ‘अपने बारे में कुछ बताओ’। और जैसे ही आप बोलना शुरू करते हैं, वो आपकी और यूँ देखता हैं(ताव में)

इन सारी स्थितयों में क्या आपका उत्तर एक ही हो सकता है? वो रटा हुआ उत्तर, क्या आपके काम आ सकता है? आ सकता है क्या?

श्रोता: नहीं।

आचार्य जी: और, ‘अपने विषय में बताईये’ प्रश्न के उत्तर में, आप अपने बारे में, अपने जीवन के विषय में, कम-से-कम पाँच विषयों का ज़िक्र तो करेंगे? कौन हूँ, कहाँ से आता हूँ, क्या पढ़ रहा हूँ, क्या करना चाहता हूँ? किस चीज़ में रूचि है! यही सब बताएँगे ना आप? अगर आप कोई उत्तर रट भी लें, इस विषय में, क्या आप बाकी उनसे संबंधित कोई प्रश्न जो उभरेंगे, उनके भी उत्तर रट पायेंगे? क्या जो अनगिनत सवाल उभर सकते हैं, एक साक्षात्कार के दौरान, उनके भी उत्तर आप रट सकते हो? कुल, मिला-जुला के कहूँ तो आप कुछ भी रट नहीं सकते। और ये जो रटने की चाह है, ये अंदर के डर से निकलती है। लेकिन आप कितना भी रट लो, वह आप पर ही भारी पड़ेगा। जो जितना ज़्यादा भर के जाएगा, तैयार उत्तरों से भरा हुआ, ठुसा हुआ, वो पायेगा कि उसके पाँव उतने ही ज़्यादा काँप रहे हैं। वो पायेगा कि आखिरी समय पर वो एकदम से जाम हो गया है, उससे बोला ही नहीं जा रहा। कुछ बोला ही नहीं जा रहा!

उदाहरण देता हूँ आपको एक – सन दो हज़ार की बात है, मैं अपना आई. ए. एस. का पेपर दे रहा था, उसके साथ मैंने कैट का फॉर्म भी भरा हुआ था। पंद्रह नवम्बर को मेरा सिविल सर्विसेज का आखिरी इम्तिहान था, और दस दिसंबर को कैट का इम्तिहान था। पंद्रह नवम्बर तक, लाज़मी सी बात है, मैं सिविल सर्विसेज की तैयारी करता रहा। जब उसका आखिरी पेपर दे दिया तो एक दिन शान्ति से आराम किया, मैंने कहा, चलो अब कैट को भी देख लेते हैं। मुश्किल से तीन हफ्ते बचे हैं। तो, बस ये जानने के लिए, कि दूसरों की तुलना में खड़ा कहाँ पर हूँ; आई. आई. टी. में ही एक टेस्ट-सीरीज चल रही थी, एक सज्जन आते थे, तो उसको ज्वाइन कर लिया, हफ्ते में एक बार जाना होता था, और सिर्फ टेस्ट देना होता था, और वो परिणाम लगाते थे, कि खड़े कहाँ पर हो। करीब २०० अगर उसमें आई.आई टीएन रहे होंगे जो उसमें शिरकत करते थे, हर हफ्ते। और मैं वहाँ पर जाता था, निश्चित रूप से, जब आपकी कुल तीन हफ्ते की तैयारी है, तो आपकी क्या रैंक रहेगी? जब मैं पहले हफ्ते वहाँ पर टेस्ट देने गया तो सिर्फ उन २०० लोगों में, मेरा जो नंबर था, वो करीब अस्सीवाँ था। कुल तीन हफ्ते मैंने वहाँ सैंपल टेस्ट दिया। अस्सी से बढ़कर के, अंततः जो मेरी रैंक आती रही होगी, वो तीस या चालीस होगी। और जिन छात्रों की रैंक, उनमें से लगातार टॉप फाइव में आती थी, उनके और मेरे अंकों में अंतर छोटा-मोटा नहीं होता था। मैं तब की बात कर रहा हूँ, जब कैट में १८० सवाल होते थे। कैट तो सब जानते ही हैं ना! उन १८० सवालों में मेरे जो नम्बर आते थे, उसमें नेगेटिव मार्किंग भी होती थी, वो आते थे १००-११०; और जो लोग टॉप करते थे, उनके मार्क्स आते थे १५० तक! इतना भारी अंतर होता था, १००-११० और १५०!

कैट का दिन भी आया, और उस दिन एक दुर्घटना हुई, ज़बरदस्त। दुर्घटना ये हुई, कि कैट का पूरा पैटर्न बदल गया! चार सेक्शन आते थे, वो तीन कर दिए थे। और लोगों ने बड़ी तैयारी कर रखी थी, कि चार सेक्शन आते हैं हमेशा, और चार सेक्शन में हम इतना-इतना समय देंगे, दो घंटे का होता है, एक सेक्शन को इतना समय दूँगा। कैट बड़ा प्रेडिक्टेबल होता था। यहाँ पर ऐसा कर देना है, वहाँ वैसा कर देना है। और उस साल, प्रश्नों की संख्या बिलकुल कम कर दी गयी। क्योंकि प्रश्न मुश्किल कर दिए गए। यह सबके लिए एक धक्का था। और यहाँ तक कि प्रश्नों के प्रकार भी पिछले सालों से अलग कर दिए गए! ठीक है?

खैर, मैंने पेपर दिया। जिसने दो-तीन हफ्ते तैयारी करी है, तो उसकी कोई अपने आप से विशेष अपेक्षाएँ होती नहीं हैं। मेरे लिए उस कैट का कोई विशेष महत्व था भी नहीं। मैं तो सिविल-सर्विसेज की तरफ ही नज़र कर के बैठा था। मैंने पेपर दिया, वैसे ही दिया, जैसे हमेशा दिया करता था। मेरे हमेशा भी १००- ११०- १२० अटेम्प्ट्स हुआ करते थे। बहुत हुआ तो ११५ अटेम्प्ट्स हो जाते थे। इस बार दे कर निकला तो ११३ अटेम्प्ट्स थे। मैंने कहा ठीक है, जैसे हमेशा होता है वैसे इस बार भी हुआ है। बाहर निकलता हूँ तो पता चलता है कि यहाँ रोना-पीटना मचा हुआ है, सेंटर पर।

मेरे ही साथ के बहुत लोग थे, वही टोप्पर्स वगैरह, बिलकुल ऐसे हो रहे थे कि बस बरस ही पड़ेंगे। पता चलता है, यहाँ पर किसी ने १०० भी नहीं अटेम्प्ट किये। और क्यों नहीं अटेम्प्ट किये? क्योंकि उन्होंने तैयारी बहुत जम के कर रखी थी। अब तैयारी थी, कि चार सेक्शन आयेंगे, और इस इस तरह के सवाल आयेंगे। ना सेक्शन चार हैं, और सवाल बिलकुल बदल गए हैं। कैट का परिणाम आता है, तो उसमें मुझे पता चलता है, कि मैं ऑल-इंडिया कैट टॉपर हूँ। १०० प्रतिशत आये! और वो इसलिए नहीं हुआ था कि तीन हफ़्तों में मैंने कोई विशेष गुल खिला लिया। वो इसलिए हुआ था, क्योंकि सहजता से जा कर के, जो सामने था, उसका उत्तर दे दिया था। मन में कोई अपेक्षाएँ नहीं ले कर गया था कि इस तरह का सवाल आएगा तो ऐसे करूँगा। ना पहले से कोई पूर्व-नियोजित स्ट्रेटेजी थी मेरे पास। और लोगों के पास थी, कि घुसते ही उन्होंने सीधे धड़ल्ले से, समय बचाने के लिए चौथे पेज को खोला। और चौथे पेज पर वो है ही नहीं जो सोच के गए थे, तो होश उड़ गए, कि अब क्या करें!

(छात्र हँसते हैं)

और आप भी यही सोच के जा रहे हो, कि घुसते ही साक्षात्कारकर्ता पूछेगा, ‘अपने बारे में कुछ बतायें’, और वह भी जानता है अच्छे से, आप बच्चे हो ! वो हो सकता है यह भी पूछ ले, क्यों मियाँ किस गाँव से आ रहे हो? तुम सोचोगे, ओह ये तो रटा ही नहीं।

(अट्टाहस)

ये तो रटा ही नहीं! और आप कहोगे, कोई अभी मिल जाए तो उसकी गर्दन दबा दें, मार दें, अद्वैत वालों ने वो पूरी शीट बना कर दी थी, “इंटरव्यू में पूछे जाने वाले प्रश्न,” उसमें ये तो लिखा ही नहीं था, कि ‘और मियाँ किस गाँव से आ रहे हो?’! इसका उत्तर क्या दिया जाना चाहिए?

आपने अपने सीनियर्स को देखा, बहुत ख़ुशी की बात है कि १६८ प्रत्याशी चुने गए। बहुत अच्छी बात है कि तीन ही साल पहले, मात्र बीस लोग चुने गए थे। वो एक झटके में उठा कर के १२० किये गए, फिर १६८ हो गए। पूरी इच्छा है कि इस बार कम-से-कम २०० हों। और ज़्यादा हों। लेकिन जब आप अपने सीनियर्स के परिणाम देखते हैं, तो अपने सीनियर्स की हालत भी देखिये। देखिये, कि जब चल रही होती है वो प्रक्रिया, तो उनकी क्या हालत होती है? पसीने छूट रहे हैं। अब आपने पहन रखी है नयी शर्ट, साक्षात्कार के दिन, पर आपको अच्छे से पता है कि सितम्बर में उमस तो होती ही होती है। और वो शर्ट जो है, वो भीग-भाग के, नीली-पीली हो गयी है। इतने धब्बे दिखाई दे रहे हैं उसमें पसीने के। और आप अंदर घुस रहे हैं तो, महक रहे हैं! और उसने वहाँ बोल दिया, कि चलिए छोटा सा अल्गोरिथम लिख दीजिये, ‘हाऊ टू जेनेरेट द फाइबो-नाकि सीरीज?’ और आप लिख रहे हैं, काँपते हाथों से! और वो कह रहा है आपसे, पानी पीलो, पानी पीलो। और पूरा आप रट कर गए हैं। और रटने में फिर ये भी सम्भव है कि कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना हो जाए! जाना था जापान, पहुँच गए चीन। और रट कर गए थे, ‘अपने आप को आगे के दस साल में कहाँ देखते हैं?’ उसने पूछ दिया, ‘अपने को एक साल में कहाँ देखते हैं?’ अब आपने कहा, शून्य की क्या महत्ता?

(छात्र हँसते हैं)

और हो भी महत्वपूर्ण तो हम करें क्या? हमारे पास एक ही औजार है, और कोई भी स्थिति हो, चलाना तो वही है! तो आप बोल रहे हैं, एक साल में मैं टी. सी. एस. का सी. ई. ओ. बनना चाहता हूँ! तो वो कहता है, हैं?

(अट्टाहस)

भाई, कहा जाता है कि जब मेरे पास सिर्फ हथौड़ा होता है, औजार की जगह, तो मुझे हर समस्या कील नज़र आती है। जब मेरे पास सिर्फ हथौड़ा है, मैं और कुछ चला ही नहीं सकता! तो मुझे अगर किसी जगह सुई की आवश्यकता है, वहाँ मैं हथौड़ा ही चलाउँगा, क्योंकि सुई तो मेरे पास है ही नहीं। मुझे हर स्थिति में मात्र हथौड़ा चलाना आता है। कोई भी सवाल हो, मुझे उत्तर तो वही देना आता है, जो मैंने रट रखा है। सहजता तो मैंने सीखी ही नहीं है। और अगर आपको कोई सिखाता है, कोई कहता है, कि उत्तर रटो मत, बात को समझो, डरो मत। तो आपको लगता है ये बड़ा अपराध किया जा रहा है हमारे साथ। मेरे ख्याल से आपको एक अर्ज़ी देनी चाहिए, ‘क्वांटम’ को, कि साक्षात्कार के प्रश्नों की भी कोई कुंजी बना के दो। तो ‘क्वांटम’ इंटरव्यू-गाइड भी आ जाएगी। लेकिन उतना ही है, कि वो पुल के उस पार के देश में काम करती थी, पुल के इस पार के देश में वो काम करेगी नहीं कुंजी।

अभी तक आपने जो करा है, उस अतीत को ख़त्म करिये। आगे वैसे काम नहीं चलेगा।

क्या-क्या सिखायें आपको? क्या-क्या सिखाया जा सकता है? अनगिनत है सब कुछ! जब आप एक इंटरव्यू-रूम में आते हैं तो उसका प्रयोजन समझिये! वहाँ पर आपको बस ये बताया जा सकता है कि बुनयादी स्तर पर, आप कहाँ चूक रहे हैं! डीटेल्स नहीं बताये जा सकते, ना बताये जाने चाहियें। अगर किसी ने आपको डीटेल्स बता दिए, तो वो आपके साथ गड़बड़ कर रहा है। अगर किसी ने आपको डीटेल्स बता दिए; अब आप आते हैं, पूछते हैं, मैम मेरी कमज़ोरियाँ क्या हैं, क्या बोलना चाहिए उसमें मुझे? तुम्हारी कमज़ोरी है या मेरी कमज़ोरी है? और मैं अपनी कमज़ोरी बता भी दूँ, तो तुम उसको वहाँ पर डिफेंड कर लोगे? कर लोगे क्या? मैं तुमको बता दूँ, कि तुम्हारी ताकतें क्या-क्या हैं, उसको तुम साक्षात्कारकर्ता के सामने डिफेंड कर लोगे?

इसका उत्तर तो सिर्फ आत्म-मनन से ही निकल सकता है ना? अपने आप को देखना पड़ेगा। और अगर वास्तव में कोई ताकत नहीं है, तो ईमानदारी से कहना पड़ेगा, कि अभी तक मैंने अपने आप में कोई विशेष ख़ासियत पायी नहीं है, हाँ, इतना जानता हूँ कि मैं ऐसा हूँ। टी. सी. एस., या कोई भी दूसरी कंपनी, जिसमें आप साल भर बैठेंगे, यहाँ पर दैविक इंसान हायर करने नहीं आ रही है, उन्हें पता है वे कहाँ आ रही हैं। उन्हें अच्छे से पता है वे किस श्रेणी में जा रहे हैं, और वहाँ से उन्हें क्या चाहिए। उन्हें अच्छे से पता है। तो इसमें आपको घबराने की कोई बात ही नहीं है। आप जो हैं, जैसे हैं, उसको ईमानदारी के साथ सामने रख दें। और इतना काफ़ी होगा। इतना काफ़ी होगा।

ये बात समझ मे आ रही है? ये सुनने में अजीब सी लगती है, क्योंकि ये आपके पूरे इतिहास के विरुद्ध जाती है। पर इतिहास ख़त्म हो रहा है, उसको समझें आप। आपका इतिहास आपको बताता है, उदाहरण के लिए, आपक कभी भी जाईये किसी एग्जामिनेशन-सेंटर में, तो आप देखेंगे कि दो अलग-अलग दुनिया हैं। एक वो जो एग्जामिनेशन रूम के बाहर की है। जहाँ बिलकुल चिल्ल-पौं मची हुई है। और बस्ते फेंके हुए हैं, और आपस में – बताइयो इसका उत्तर क्या है! ठीक है? ध्यान आ रहा है? एग्जामिनेशन-सेंटर पर कैसा माहौल रहता है, बाहर कमरे के? और एक दूसरी दुनिया है, जो अंदर है कमरे के, जहाँ पर सब शांत हैं। और बिलकुल चुप्पी सी है। ऐसा है ना? दो अलग-अलग दृश्य हैं बिलकुल! और आपने ये जाना है, कि बाहर उतना करो, जल्दी-जल्दी सवाल पूछो, ये सब करो तो उससे अंदर मदद मिलती है। और आप सोचते हो कि वही आप अभी भी कर लोगे! तो नतीजा क्या होता है? आज जब कोई इंटरव्यू दे कर बाहर निकलता है, तो तीन-चार उस पर टूट पड़ते हैं। एक आध-दो मौकों पर तो गिरा भी दिया।

(छात्र हँसते हैं)

बता बता क्या पूछा, क्या किया? वो गुहार मार रहा है, बचाओ!

(अट्टाहस)

उस मनोस्थिति के साथ जहाँ आप बाहर डरे हुए हैं, हर किसी से पूछ रहे हैं, बता क्या पूछा! उस मनोस्थिति के साथ ही तो आपको अंदर आना है। वह व्यक्ति जो इंटरव्यू रूम के बाहर है, वही व्यक्ति रहेगा जब वो इंटरव्यू रूम के अंदर होगा? ठीक? अगर वह व्यक्ति रूम के बाहर डरा हुआ, सहमा सा, और असुरक्षित महसूस कर रहा है, तो वो रूम के अंदर जा कर के क्या सुरक्षित, आश्वश्त, और निडर हो जाएगा? क्या यह सम्भव है?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य जी: यह सम्भव नहीं है। पर क्या आपने कभी ये देखा है, कि इंटरव्यू रूम के बाहर आप कैसे खड़े होते हैं? और आपको लगता है, कि बाहर कुछ भी कर लो, असली चीज़ तो अंदर हो रही है। नहीं, असली चीज़ अंदर नहीं हो रही है। आपकी पूर्णता को न्योता है। आप जो पूरे हैं!

आप में से कई लोग पता नहीं कैसी-कैसी पृष्ठभूमियों से आये होंगे, जहाँ पर आपने देखा है कि बिलकुल दबंग बन कर, और पता नहीं क्या कर के, सब हो जाता है। घर पर ही एग्जामिनेशन-सेण्टर पड़ा था, तो ये देखा कि दुनिया ऐसे ही चलती है। तो एक इंटरव्यू चल रहा था, तो जनाब अंदर आते हैं, पूछा जाता है, ‘अपने बारे में बताईये?’ तो जवाब आता है, ‘छोटा पैकेट बड़ा धमाल’।

(अट्टाहस)

ये वास्तविक घटना बता रहा हूँ, अभी आप के ही यहाँ पर हुई है, दस दिन पहले। ये उनका परिचय है! अब ये छोटा पैकेट कहाँ से निकल रहा है? ये कहाँ से आ रहा है? ये आ रहा है कन्नौज से। ये आ रहा है वहाँ से, जहाँ पर उन्होने देखा कि चुनाव जीते जाते हैं बूथ-कैप्चरिंग कर के। जहाँ उन्होंने देखा, कि फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुमने चुनाव जीता कैसे? एक बार तुम राजाजी बन गए, तो बन गए पाँच साल के लिए। तो उनको लगता है, वही यहाँ भी चलेगा। ये वास्तव में इंटरव्यू रूम में आये थे बूथ-कैप्चरिंग करने के लिए। इन्होंने देखा है, जहाँ से भी ये आ रहे हैं, कि इम्तिहान चल रहा हो, टेबल पर ऐसे गाड़ दो, और उसके बाद सीधे नब्बे प्रतिशत आते हैं गणित में। और जो इंविजिलेटर होता है, वही आ-आ कर के उत्तर बताता है। और वो वही काम यहाँ करने आये थे। छोटा पैकेट बड़ा धमाल। तो हमारे साक्षात्कारकर्ता भी इस देश से तो हैं नहीं, वो तो दूसरे देश से हैं। उन्होंने सब बंद कर दी, शीट-वीट। उन्होंने कहा, पहले छोटा पैकेट दिखाओ, तब आगे बात होगी। और यहाँ से जाने नहीं देंगे, जब तक छोटा पैकेट देख नहीं लेंगे। और ये भी समझाओ, कि छोटा पैकेट, छोटा कैसे रह गया?

अब हालत खराब है! और जब उठे, तो पूरी कुर्सी नीचे गीली थी, पसीने से! इतना पसीना। तो बड़ा धमाल उतना ही देखने को मिला बस।

(अट्टाहस)

इस बात को दिमाग से निकाल दीजिये, कि आप अपने वही पुराने तौर-तरीके जारी रख सकते हैं। अभी तक आपने जो पूरा तंत्र, पूरी व्यवस्था देखी है, वो आपके आस-पास की ही है। आप, ये, वो! आपने जो भी देखा है, वो इस व्यवस्था के बाहर का है ही नहीं। आपकी जो भी कामयाबी-हार हुई हैं, वो इस तंत्र के भीतर हुई हैं। अब जो लोग आ रहे हैं, और जिस दुनिया में आप प्रवेश करने जा रहे हैं, वो सब कुछ इसके भीतर का नहीं है। इतनी बात आप समझते हैं ना? जो यहाँ पर चलता था, वहाँ नहीं चलेगा। जिस चीज़ को यहाँ महत्त्व दिया जाता था, वहाँ पर उसको दो-कौड़ी का समझा जायेगा। और वहाँ पर जिस बात को महत्त्व दिया जाता है, वो आप समझ नहीं रहे, वो आप समझना चाहते नहीं, तैयार नहीं, आपको डर लगता है।

बिलकुल नज़रिए में ही पूर्ण बदलाव की आवश्यकता है।

एक और चीज़ जो वहाँ से ही आ रही है, जहाँ से आप हैं, कि हर चीज़ आपको, बिलकुल चाशनी के जैसे चटा दी जाए। क्या प्रोफेशनल दुनिया ऐसे चलती है? या वहाँ पर अपना रास्ता खुद निकालना होता है? या वहाँ पर बिलकुल, लल्ला लल्ला लोरी, दूध की कटोरी, रखी है सामने, खाओ। ऐसे चलता है क्या वहाँ पर?

ऐसे तो नहीं चलता!



शब्द-योग सत्र से उद्धरण। स्पष्टता के लिए सम्पादित।

संवाद देखें : आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: नयी दुनिया और पुराने तरीक़े


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आचार्य प्रशांत जी की पुस्तकें व अन्य बोध-सामग्री देखने के लिए:

http://studiozero.prashantadvait.com/

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