आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर: सांयोगिक से आत्मिक तक

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हुकमी हुकमु चलाये राहु।

~ नितनेम

आचार्य प्रशांत: वो अपने हुक्म से राह पे चलाता है। राह तो सामने ही है। जहाँ खड़े हो वही से चलती है। हुकुमी ‘स्वभाव’ ही है तो कहीं दूर जाना नहीं है पूछने। हुक्म तभ भी उल्टा–पुल्टा हो जाता है, कदम फिर इधर–उधर पड़ते हैं क्योंकि जो दुनिया में सबसे अजीब काम हो सकता है, वो होता है। बाकी सब याद रहता है, अपने को भूल जाते हैं। कैसे याद रखें कि ‘पूछें’। कैसे याद रखे की ‘उससे’ पूछ के ही करेंगे।

श्रोता: समभाव मान लेना।

आचार्य जी: किसकी?

श्रोता: मन की।

आचार्य जी: ठीक है फिर। कृपया इस बात को मान लीजिये की आप भूल गए हैं ‘उसे’। कितनी सहूलियत भरी बात है न। यह भी भूल जाइये की उसकी मर्ज़ी है। यदि आप पूर्णत्या सब कुछ स्वीकरना चाहती हैं तो भी उसे भूल जाइये की उसकी मर्ज़ी जैसी कोई चीज़ है। यही याद रखिये की सब कुछ अहंकार है। उसकी मर्ज़ी है, उसी पे चलना हैं।

श्रोता: तो जब तक अहंकार है हम उसको को याद रख पाएँगे क्या?

आचार्य जी: समभाव शुरुवात नहीं हो सकता। ये बहुत ही हानिकारक बात हो जाएगी यदि शुरुवात में ही बोल दिया गया। शुरू में विवेक चाहिए। अंत में विवेक भी नहीं चाहिए। विवेक का अर्थ ही होता है ‘वैराग्य’, न की समभाव। जिस किसी ने भी तुम्हें पढ़ा दिया है समभाव, वो अभी समझता नहीं है।

श्रोता: पिछले बुधवार हमने जो विडियो चलाया था उसका जो अनुवादित संस्करण आया था। उसमें यह बार-बार दोहराया जा रहा है “समभाव।

आचार्य जी: अनुवादित संस्करण भूल जाइये। ‘समभाव ‘ तो फिर यह भी है की नितनेम क्यों पढ़े, मस्तराम पढ़ें, समभाव

श्रोता: मस्त नहीं। पूर्ण के मतलब मस्तराम शामिल नहीं!

आचार्य जी: यदि पूर्ण में शामिल नहीं है तो पूर्ण कैसे? यदि कुछ बाहर छूट रहा है तो पूर्ण कहाँ?

श्रोता: अगर आप मस्त मूवी का कोई ख्याल न लायें।

आचार्य जी: मैं मस्तराम की बात कर रहा हूँ! ये एक अशलील पत्रिका है। जब आप कहते हो समभाव तब आपका मन कहता है न ‘वैराग्य’ और न ही ‘विभाजन।’ समभाव, फल है। शुरवात में तो वैराग्य है उसके बाद? विवेक!

आख़री कदम पर आकेअष्टावक्र कहते हैं की “कह विवेक कह वैराग्य।” कैसा विवेक और कैसा वैराग्य। वो ख़री बात है। ‘साधक’ जहाँ शुरू करता है वहाँ उसे विवेक चाहिए। जो शुरू कर रहा हो वो कह रहा हो, ना, मुझे कोई विवेक नहीं चाहिए। उसको तो भेद करना पड़ेगा की क्या लूँ और क्या ना लूँ। किसके साथ रहूँ और किससे बचूँ।

आख़री कदम पर जाके आप कह सकतो हो की अब किसी के भी साथ रह लूँ कोई फर्क नहीं पड़ता तो समभाव। तो अब काला और सफ़ेद एक बराबर हो गया। अब मुझे कोई बीमारी लग ही नहीं सकती तो इसीलिए मैं किसी के भी साथ रहूँ कोई अंतर नहीं पड़ता। वो परम स्वास्थ को उपलब्ध हो जाने के बाद है। शुरू में नहीं है।

शुरू में तो ‘वैराग्य’ चाहिए और वैराग्य का मतलब होगा ‘अस्वीकृति’, की कुछ है जिसको मुझे अपने से दूर रखना ही पड़ेगा।

‘समभाव’ बड़ा सुविधा जनक शब्द है, मन के लिए। क्योंकि हमें पता है, हम गन्दगी से घिरे हुए हैं और समभाव का मतलब होता हि है की गन्दगी को कायम रहने दो। गंदगी को स्वीकार लो। तुम्हें ज़रूरत ही नहीं गंदगी साफ़ करने के लिए साहस इकठ्ठा करने की। आसन है, समभाव। सब उसकी मर्ज़ी है, उसने दिया है। वज़न क्यों खूब बड़ा हुआ है मेरा? ४० किलो उसने दिए हैं ज़्यादा। जीवन मैं गन्दगी ही गन्दगी क्यों मौजूद है? उसने दी है। अब उसने दिया है तो मैं उसको पालूँगा।(व्यंग्य) यह चित्त को बहलाने की बातें हैं।

  समभाव नहीं ‘गहरा विद्रोह’

अभी आपको जिसकी ज़रूरत है वो है ‘गहरा विद्रोह’ जैसे की एक एक योद्धा करता है — “मैं किसी भी तरह की गंदगी नहीं बर्दाश्त करूँगा अपने मन पर।”अप्रतिरोध की दूसरी अवस्था होती, अभी वो बाद में आएगी। उसकी बहुत कीमत है, अप्रतिरोध की। की मैं एक बहाव में हूँ, मैं विद्रोह नहीं करता।  लेकन वो पहला चरण नहीं हो सकता क्योंकि आप कैसे भी करके अभी ग़लत दिशा की ही और जा रहे हैं।

अभी आपको उस ग़लत दिशा को थामने की ज़रूरत है, बजाए ये कहने के की मैं बहाव में हूँ। क्या आप बहाव में नहीं हो? ज़िन्दगी जहाँ चाह रही है, ले जा रही है। आप बह रहे हो। अभी आप जिस तल पर हैं, वहाँ से ये मत कहिए की मैं बह रहा हूँ। आपको वो वीडियो याद है, दो तरह के बहाव — ‘आकस्मिक’ और ‘वास्तविक’। आप अभी आकस्मिक बहाव में बह रहे हैं। बहना बंद कीजिए! कोशिश मत कीजिये लाओ तज़ु या बुद्धा बन्ने की इस तल पर की जीवन नदी के समान है मैं बहता जा रहा हूँ उस नदी में।

आपका बहाव, एक झूठा बहाव है। रोकें उस बहाव को, विरोध करें।

न की कहें की समभाव, बहना बंद करें।

जब साधक एक अवस्था पर आ जाता है तब उसको अपने आप अभेद दृष्टि मिल जाती है। अपने आप मिलती है। वो बोई नहीं गई होती है। जहाँ उसको काला-गोरा, दुःख-सुख एक सा लगने लगता है। वो होता है समभाव। वो बोया नहीं गया होता की दुःख तो खूब लग रहा है पर क्योंकि दुःख को ख़तम करने की हिम्मत नहीं है तो हमने क्या कह दिया, राम की मर्जी है और हिंदुस्तान में यह खूब हुआ है। हम नियतिवादी बन गए हैं, की गड्ढे में गिरे हुए हैं, कीचड़ से सने हुए हैं पर कुछ करेंगे नहीं क्या कहके? जैसी हरी की इच्छा। अरे! हरी की इच्छा है की तुम सड़ो।

इस देश ने बड़े से बड़े सूत्र का खूब दुरपयोग किया है। खूब बच्चे पैदा करो और फिर कहदो की यह तो अल्लाह की देन हैं। बेहोशी के कर्म करो और कह दो की वो करवा रहा है, उसका हुक्म है।

उसका नहीं हुक्म है। फिर से आप सब से कह रहा हूँ, आप अभी यह सब बातें न करें ‘सर्वस्वीकार’, ‘सर्वमान्य’, कुछ नहीं। आप तो अभी हिम्मत रखें, हिम्मत वही देगा। श्रद्धा से ही आती है हिम्मत।

आप तो अभी हिम्मत रख कर जड़ मूल से उखाड़ो अपनी ज़िन्दगी से वो सब जिसे जिंदगी में नहीं होना चाहिये।

और यह यकीन रखो की उसके उखड़ने से आपका कुछ बिगड़ नहीं जाएगा।

देखो संतो ने वहाँ शिखर पर बैठ करके जो बातें बोली होती हैं वो बहूत ख़तरनाक बातें होती हैं। इससे बड़ा अभिशाप नहीं हो सकता और इससे बड़ा अपराध भी नहीं हो सकता की उन बातों को हम उच्चारित करें। उन्होंने कहाँ से बोली थीं, किस अवस्था से और जो उन्होंने कहा, उसको उस हालत में पहुचे बिना हम कह रहें हैं की आचरण में उतार लें तो फिर क्या होगा। फिर क्या होगा?

याद रखो जो भी पढ़ रहे हो, जो भी सुन रहे हो, जो भी कर रहे हो, उसकी प्रासंगिकता अपने जीवन में है। मेरा जीवन बेहतर बने और अगर मेरा जीवन बेहतर बनना है तो सबसे पहले अपने मन को देखना होगा की मेरा मन कहाँ खड़ा है।

मेरा मन जहाँ खड़ा है ठीक उसके अनरूप काम करना है।

मुझे संतो के अनरूप काम नहीं करना है।

मुझे अपने मन के अनरूप काम करना है और संतो ने यहीं सिखया है। अपने मन को देखो उसके अनरूप काम करो।

कबीर ने तो कह दिया है

माला फेरूँ, न जप करूँ मुख से कहूं न राम।

सुमरन मेरा हरी करे मैं करूँ विश्राम।।

तुम भी कहो हम कैसे याद रखे। कैसा सुमिरन? हरी मेरा सुमिरन करेंगे मैं कैसे सुमिरन करूँ। और मुझे कुछ याद नहीं रहता हरी के बारे में। मुझे इस बात का समभाव है। मैंने ये पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है की मैं भूल गया हूँ।

अरे! कबीर कहाँ से बोल रहें हैं की सुमिरन मेरा हरी करें। तुम्हें हक़ है कहने का अभी की सुमिरन मेरा हरी करें! है? तो तुम्हें तो खुद ही सुमिरन करना पड़ेगा। पर मुझे सुमिरन करना नहीं है। मैं अपने व्यर्थ के काम धन्दों में फसा हुआ हूँ। तो कितना अच्छा बहाना मिल गया की देखो जी कबीर ने ही कहा है की माला फिरों न जप करूँ, तो ना माला फेरनी है और ना जप करना है। मुख से कहूँ ना राम, और राम नाम मुख को गन्दा कर जाता है। मुख से तो राम नाम लेना ही मत। कबीर ने ही तो कहा है। तुरंत कबीर उपस्थित हो गए की कबीर ने ही कहा है। हम कबीर के कहने पर ही तो चल रहे हैं की राम नाम लेना ही मत। अरे! कबीर ने कबीर हो करके कहा है। तुम हो कबीर? कृष्णमूर्ति ने कहा है किसी गुरु की आवश्यकता नहीं। कृष्णमूर्ति ने कृष्णमूर्ति हो करके कहा की अब गुरु नहीं चाहिए। जब हो जाना कृष्णमूर्ति तब कहाँ किसी गुरु की ज़रूरत है। तुम कृष्णमूर्ति हो?

हुकमी हुकुम चलाये राहू। एक बड़ी ख़ूबसूरत बात कैंप में अचानक से आई थी। औषधि क्या है? चिकित्सक की याद ही है औषधि। ऐसे तरीके अपने आप को उपलब्ध कराओ जिनसे लगातार सूरती बनी रह सके। कोई और विकल्प है ही नहीं। कोई और विकल्प बिलकुन भी नहीं है।

तुम्हें अपने आपको ‘उसको’ उपलब्ध कराना होगा, इसके अतरिक्त और कोई तरीका नहीं है। और इससे सरल कुछ हो भी नहीं सकता। कुछ करना नहीं है। कुछ पढ़ना नहीं है। याद कर लेना है। ऐसी स्थिति पैदा कर लेनी है की याद उठ जाए, और उतना काफी है।

जान जाओगे किस राह चलना है। ऐसी स्थिति पैदा करलो, बिल्कुल सामने आजाए। हो गया काम। देखिये जब कबीर राम के अलावा सब कुछ अपने जीवन से निकाल देते हैं की “एक चिंता राम की दुझी चिंता न कोई”। जब कबीर राम के अलावा सब को जीवन से निकाल देते हैं, तबी जाकर के कबीर अंततः वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ कहतें हैं की ‘मुख से कहूँ ना राम।’

आप छोटा रास्ता चाहते हो। पहला कदम तो यही है की राम के अलावा जीवन में कुछ शेष रहने न दूँगा। वो ले जाता है वहाँ तक जहाँ पर राम का नाम लेने की ज़रुरत नहीं पड़ती क्योंकि राम हृदय मैं बैठ गए हैं। अब नाम क्या लेना है। बल्कि, अब नाम लोगे तो बड़ा अजीब सा लगेगा। जैसे औपचारिकता निभा रहे हो।

बोद्धिधर्म, जो बुद्ध की शिक्षा को भारत से चीन ले गया वो अपने शिष्यों से कहता था की बुद्ध का नाम बड़ा ख़राब है। जब भी बुद्ध का नाम लो उसके बाद कुल्ला किया करो, मुँह गन्दा हो जाता है। आप भी यही करिए की कभी राम का नाम ले तो कुल्ला करिए मुँह गन्दा हो गया। बोद्धिधर्म यह कह पाया क्योंकि उसने अपना पूरा जीवन ही बुद्ध को समर्पित कर दिया था। और वो जिनसे कह रहा था वो उसी के शिष्य। एक स्तर को प्राप्त हो चुके थे तो उनसे कह रहा था की अब नाम लेना ठीक नहीं। अब बुद्ध को नाम देना बिल्कुल ठीक नहीं। अब बुद्ध नहीं है अब बोध मात्र है। आप भी यही करिए की नाम ले लिया बुद्ध का, मुँह से कुल्ला करेंगे। आप की अभी वो पात्रता है। पर यह दिक्कत होती है जब ज़िंदगी में अभी न राम उतरे हैं, न बुद्ध उतरें हैं पर ग्रन्थ हाँथ में आगये हैं। ज़िन्दगी भय में और असुरक्षा में बीत रही है और हाँथ में ग्रन्थ है। अब बड़ी विद्रुप्ता की स्थिति है।

जैसे चूहा बता रहा हो कि २० किलो की तलवार कैसे भांजी जा सकती है। अरे! अपनी शक्ल देखो! तुम्हें हक़ है यह बात करने का कि २० किलो की तलवार मैदान में कैसे भांजेंगे और अहंकार को मारना कैसे है? पर चूहों का आनंद ही इसी में है की बातें ख़ूब करो की ‘मैं फलाने हाँथी के ऊपर चढ़ गया और हाँथी मेरे भोज तले दब गया। सारे हाँथी मेरी चिंघार से थर्राते हैं। ये चूहों की गोष्ठी चल रही है।

थोड़ी विनीत रहिए, थोड़ी विनम्रता दिखाईए। बड़ा बुरा सा लगता है, जब आप बड़ी-बड़ी बातें करतें हैं। थोड़ा तो आँख खोल कर अपने जीवन को देखिये और पूछिए अपने आपसे, मुझे यह बात करने का हक़ है? मैं बोल भी कैसे देती हूँ यह सारे शब्द? अर्जित करना पड़ता है ना! अर्जित किया? कीमत अदा करी?

संतो का ‘प्रसाद’ है। वो तो उछाल देतें है की लो। किसी के भी हाँथ में पड़ सकता है लेकिन काम उसी के आएगा, जो पात्र है बाकियों के हाँथ में प्रसाद पड़ेगा और मृत हो जाएगा। यह आप पक्का समझियेगा, की उन्होंने तो दे दिया की जिसको चाहिये लो कबीर की वाणी सब के लिए है। नानक के वचन सब के लिए हैं, पर हमारे हाँथ में पड़ेंगे तो, वचन मृत हो जाएँगे। हमें लगेगा जरूर की मिल गया। हमें नहीं मिला!

वचन हमारे हाँथ में पड़के मृत हो जाता है। एक जीवन्त हृदय चाहिए। जब उसके समीप वो वचन आता है, तब जी उठता है, तब अपने आप को प्रकट करता है, अन्यथा नहीं करेगा। अन्यथा बस शब्द हैं, उससे खेलते रहो। शब्द से खेल के क्या मिल जाएगा। जीवन में कोई रूपांतरण नहीं होना। तो यह ज़रा इमानदारी से अपने आप से हम पूछें की इस चर्चा का, इन बातों का कितना भाग, जीवन से आ रहा है?

छोटे सवाल पूछिए, छोटे सवाल। वो छोटे सवाल आपके लिए ज़्यादा उपयोगी हैं, यह बात मैं कम से कम पचास बार दोहरा चूका हूँ। ईमानदार सवाल रखए। वो मुद्दे रखिये जो वास्तव में जीवन में मौजूद हैं। वो ज़्यादा ठीक हैं। इसीलिए कहा की यही मत लिखो की एक पंक्ति उठाई, की एक पौढ़ी उठाई की, एक दोहा उठाया और लिख दिया। बताओ की उसमें तुम कहाँ अटक रहे हो। तुम्हारे जीवन से उसका क्या सम्बन्ध है? अब जो उत्तर होगा वो काम आएगा। अब उसकी सार्थकता है।

ऐसे ही एक और बौद्ध भिक्षु हुआ है। उसने कहा है की बुद्ध कहीं दिख जाएँ ना सड़क पर तो मार देना। आप भी मारिए। मार ही दीजिये की अरे! संतों के वचन हैं। कोई बुद्ध सड़क पर दिख जाए तो तुरंत उसका मार न सको तो कम से कम दो चार जूते तो लगा ही दो। कहाँ से बोल रहा है वो, समझिये। आपके लिए इतना ही काफी है समझाना की वो जहाँ से बोल रहा है, मैं वहाँ नहीं हूँ। पर अहंकार को बड़ी प्यारी बात लगेगी यह की ये पहला आदमी है जिसने कोई ढंग की बात करी की बुद्ध दिखे नहीं की चार जूते लगाओ। मैं तो हमेशा से ही यहीं कह रहा था। आज पहली बार ग्रथों का अनमोदन मिला है। लाना भाई वो बढ़ा वाला सड़ा वाला जूता कीलें-वीले निकली हों जिसमें।लगाएँ ज़रा। और सबसे पहले तो इन्हीं को लगाएँ जो रविवार ख़राब करतें हैं।

ग्रंथों को पढ़ते समय एक मूल विवेक है जिसको ध्यान में रखिए, क्या! मैं कहाँ खड़ा हूँ!

क्योंकि पढ़ने वाला अहंकार है और कौन पढ़ेगा। वही सब कुछ कर रहा है। वो यह ना भूले की मैं कहाँ खड़ा हूँ और उसी दृष्टि से देखे की अब मेरे लिए क्या उपयोगी है। बड़ी पीड़ा होगी यह देख कर की जो कुछ भी ऊँचा है, आकाशीय है, सुन्दर से सुन्दर है वो तो मेरे लिए उपयोगी ही नहीं है। बिलकुल मेरे लिए उपयोगी नहीं है। मेरे लिए तो बड़ी छोटी-छोटी बातें उपयोगी हैं।

आप जो ९९ प्रतिशत बातें करतें हैं वो आपके लिए फ़िज़ूल हैं। उनकी आपके लिए कोई सार्थकता, उपयोगता है ही नहीं। वो बस मुँह चलने के काम आती हैं।

सच्ची बात करें, सार्थक बात करें।

अगर आपको यह सवाल उठता है की फायदा क्यों नहीं होता तो उसकी वजह यह है की आप बीमारी छुपा रहे हो।

जो स्वास्थ का ढोंग कर रहा हो उसे कोई दवा लग सकती है?

या आप यहाँ बैठ करके स्वास्थ का ढोंग करते हो की मुझ सब समझ में आता है और खूब मुँह चलाते हो तो आपको क्या दवाई लगेगी। सबसे पहले तो ज़रा विनम्र हो करके स्वीकार करिए की ‘मैं महा रोगी हूँ’। फिर आपको आपके अनुकूल दवाई मिलनी शुरू भी हो। यह दवाइयाँ है पर उनके लिए नहीं जो अभी स्वास्थ का ढोंग कर रहे हैं।


शब्द-योग सत्र से उद्धरण। स्पष्टता के लिए सम्पादित।

संवाद देखें : आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर: सांयोगिक से आत्मिक तक

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