कौन गुरु कौन चेला

(आचार्य जी के नवीन लेखों के बारे में जानने के लिए व उनसे मिलने का दुर्लभ अवसर प्राप्त करने हेतु यहाँ क्लिक करें.)

तो ना सोच है ना विचार है, सीधा सहज कर्म है अब। सुनो, समझो और उसे कर्म में तबदील होने दो।

जिनके भी भीतर से मौन की, परम की आहटे उठनी शुरू हुई हैं, उन्हें घाव ज़रूर मिले हैं। वही उनका पुरस्कार है।

बुद्ध का होना ही हमारे लिए एक अपमान की बात है। उसका होना ही लगातार-लगातार हमें ये बताता है कि हमारे रास्ते कितने टेड़े, कितने  गलत हैं और कितने मूर्खतापूर्ण हैं। और कोई दिन-रात आपको ये ऐहसास कराए, अपने होने भर से ये ऐहसास कराए, कुछ ना बोले तब भी ये ऐहसास कराए कि तुम पगले हो, तो आपके सामने विकल्प क्या है? आपको उसे मारना ही पड़ेगा, आप चिढ़ जाओगे। और यदि आपकी मारने की इच्छा नहीं हो रही है बल्कि उसे और सम्मान देने की इच्छा हो रही है, इसका एक ही अर्थ है कि वो आपके ही जैसा है। फिर तो ‘एक डाल दो पंछी बैठे कौन गुरु कौन चेला’

ये सूरमा, ये योद्धा, ये संत, अंदर से पूरा भर चुका होता है। या यूँ कहिये कि खाली हो चुका होता है, एक ही बात है, वहाँ तो अब सिर्फ मौन बचा है और उस मौन ने उसको पूरा लबरेज़ कर दिया है।

क्योंकि हम ऐसे आसक्त हैं गंदगी से की जिसने आकर हमारा घर साफ़ किया, हमने उसी को मार डाला।

आपको बाड़ी सुविधा ही जाए। न गगन से कोई आवाज़ आए, न कोई सूरमा हो, न कोई खेत बुहारने के लिए इच्छुक हो, बाड़ी सुविधा रहे।

आज जो कुछ भी आपके पास जो आपको शान्ति देता है, जिसके कारण आप इंसान कहलाने के हकदार हो तो वो इन्हीं लोगों से मिली है। इन्हीं लोगों से, जिनको आपने घाव दिए बदनाम किया। जो आपको फूटी आँख नहीं सुहाए। जिनको लेकर आपके मन में हमेशा कलेश, शंकाएँ बनी ही रहीं।

कौतुहल के नाते ही सही ज़रा ध्यान तो दीजिए की कैसा होगा वो। जिसको दीखता होगा की इन रास्तों पर बड़ा खतरा है, जान का जोखिम है और फिर भी वो हँस के कहता होगा — मुझे मरण का चाव, मुझे इन्हीं पर चलना है। हमें जहाँ दिखाई देता है की खतरा है, हम अपनी बड़ी होशियारी समझते हैं इस बात में की उन रास्तों से अलग हो लें, मुड़ लें और ये कैसा होगा पागल, मस्त। थोड़ा इसकी मस्ती को भी अनुभव कर लीजिए।

क्या राज़ है जो उसने जान लिया है और जो हमें नहीं पता? कौनसा सच है जो उसको प्रकट हो गया है और हमसे छुपा हुआ है? थोड़ा ध्यान दीजिये, स्पष्ट हो जाएगा।

ऐसे डरे हुए हैं की आँख खोलकर देख भी नहीं पाते। आक्रंत हैं। सत्य बेताब है आने को। आता है, बार-बार सामने आता है, तुरंत मुँह फेर लेते हैं, पीठ दिखा देते हैं।


पूरा लेख पढ़ें: आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर: मुझे मरण का चाव

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s