आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: गंभीरता क्या होती है?

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प्रश्न: गंभीरता क्या है?

आचार्य प्रशांत: गंभीरता का अर्थ है कि कुछ बहुत महत्वपूर्ण है, गंभीरता एक भाव है कि कुछ बहुत महत्वपूर्ण है, जब भी आपको कुछ बहुत महत्वपूर्ण लगेगा, आप गंभीर हो जाओगे।

तो इसमें तो कोई गड़बड़ दिखाई नहीं दे रही, मुझको लगा कि कुछ बहुत महत्वपूर्ण है तो मैं उस विषय में क्या हो गया?

गंभीर हो गया।

तो दिक्कत क्या है?

दिक्कत है छोटी-सी, इसको समझेंगे: दिक्कत ये है कि कुछ भी महत्वपूर्ण हो सकता नहीं। किसी भी बात को बहुत महत्वपूर्ण मानने का ये अर्थ है कि उससे मेरे होने पर, मेरे चैन पर, मेरे आनंद पर, मेरे प्रेम पर कोई अंतर पड़ सकता है। जीवन में जो कुछ भी असली है, मूलभूत है वो छिन सकता है, ये भाव है गंभीरता।

जिसको ये पता होता है जो असली महत्व का है, वो मेरे पास पहले से ही है। जो वास्तविकता में महत्वपूर्ण है वो मेरे पास पहले से ही है, उसके लिए फिर कभी कुछ बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह जाता, उसके लिए सब एक खेल बन जाता है, वो कहता है ठीक है जीतेंगे-हारेंगे, पर जीते-हारे तो खेल में जीते-हारे, कुछ बिगड़ थोड़े ही गया।

हम जो है हम वही रहे, खेल में जीत भी गए, खेल में हार भी गए तो मिल क्या गया और छिन क्या गया?

पर जो ये नहीं समझता कि ये सबकुछ खेल भर है वो कहता है, ‘ये खेल थोड़े ही है, कुछ बहुत बिगड़ जाएगा, बहुत गंभीर बात चल रही है। ये बहुत महत्वपूर्ण लड़ाई है, और अगर मैं इसको हार गया तो बहुत लंबा-चौड़ा नुकसान हो जायेगा’।

ये नासमझ आदमी है। ये नासमझ आदमी इसलिए है क्योंकि तुम्हारा कोई लंबा-चौड़ा नुकसान हो ही नही सकता। तुम जैसे भी हो बढ़िया हो, तुम्हारा नुकसान क्या होगा? तुम्हे बड़ी-से-बड़ी नाकामयाबी मिल जाए फिर भी तुम बढ़िया हो, नुकसान क्या होना है।

लेकिन उसमें एक बाधा है, और बाधा यह है कि हमें लगातार बताया यह गया है कि हम तभी कुछ हैं जब हमने कुछ पा लिया है, बचपन से हमे ट्रेनिंग य यह दी गई है। हमसे ये कहा गया है कि तुम किसी भी लायक तब हो जब तुम कुछ करके दिखाओ। तुमसे यहाँ तक भी कहा दे गया है कि तुम प्रेम के काबिल भी तभी हो जब तुम कुछ बन के दिखाओ।

यह बड़ी ज़हरीली बातें हैं जो कह दी गई हैं क्योंकि तुम कुछ बनो-न-बनो, तुम कुछ पायो-न-पायो, तुम्हारी मूलभूत काबिलियत पर कोई अंतर नही पड़ता, तुम सदा प्रेम के काबिल हो।

ठीक है, कोशिश करो तुम्हें जो करनी है, तुम्हें जो भी दौड़े दौड़नी है तुम दौड़ो; पर फर्क नहीं पड़ता है कि तुम उनमें जीत रहे हो या हार रहे हो क्योंकि हमें जिस चमकते हुए हीरे की बात करी थी वो तुम्हारे पास हमेशा है। अब तुमको ये दो रुपए, चार रुपए की चीजें मिलती हैं नही मिलती हैं इससे तुम्हारी अमीरी पर फर्क नहीं पड़ेगा। जिसके पास अरबों हो वो क्या इस विषय में गंभीर हो सकता है कि चार रुपये और मिले या नहीं मिले।

पर तुमसे ये कभी कहा ही नहीं गया कि तुम्हारे पास अरबों पहले से मौजूद हैं, तुमसे कहा गया कि तुम भिखारी हो और अब संसार में जायो और अपने लिए कुछ अर्जित करके लायो। तो इस कारण तुमने जीवन को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। तुम गंभीर हो गए हो तुम्हारे चेहरे लटक गये हैं, हँसा नही जाता, हर समय हालत ऐसी रहती है कि कोई पागल कुत्ता पीछे लगा हुआ है।

अभी भी कुछ हँसे, और कुछ अभी भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं और कुछ बेचारे हँसे भी है तो लग रहा है रो पड़े है, क्या करे भई! बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारियाँ उठानी हैं।

एक बार क्या होता है, एक खरगोश बड़ी तेज़ी से भागता हुआ जा रहा है और हाथियों के बीच से गुज़र गया और ज़िराफों के बीच से निकल गया और पूरी ताकत से वो दौड़ रहा है, उसका बहुत गंभीर चेहरा है, तुम्हारे ही जैसा।

तो वो दौड़ रहा है और दिख रहा है कि आज वो कुछ महत्वपूर्ण करके हीं मानेगा, तो हाथियों ने पूछा, ‘तो भाई कैसे, क्या हुआ? क्यों दौड़ रहा है?’

तो उसने कहा, ‘बात तो करो मत! तुम सब वेल्ले हो, तुम्हारे पास करने को कुछ नहीं, हम कुछ गंभीर कर रहे हैं’

तो वो पूछते हैं, ‘क्या?’

खरगोश बोला, ‘आसमान टूट रहा है, गिरेगा तो मैं दौड़ रहा हूँ’।

हाथी ने थोड़ी अकल चलाई और बोला, ‘हाँ! टूट तो रहा होगा, गिर तो रहा होगा, तेरे चेहरे पर इतनी गंभीरता है, तो तू सच ही बोल रहा होगा पर ये बता तू भाग के जाएगा कहाँ? जहाँ भी जाएगा आसमान वहीं है, गिरेगा तेरे ऊपर’।

खरगोश ने कहा, ‘तुम रह गए ना बेवकूफ के बेवकूफ! अरे ! भाग कौन रहा है, हमारे ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है, हम जा रहे हैं पहाड़ पे चढ़ने ताकि जब गिरे तो थाम लें, हम थामेंगे नहीं तो तुम सब हाथी, जिराफ दब के मर जाओगे!’

तो ऐसे ही हम सब भी बड़े गंभीर हैं।

बड़े-बड़े काम कर के दिखाने है, बड़ी ज़िम्मेदारियाँ उठानी हैं, परिवार को आगे बढ़ाना है, राष्ट्र को चमकाना है, धर्म का नाम रौशन करना है, तो गंभीर होना पड़ेगा न?

हँसना गुनाह है!

हल्के कैसे हो जाएं?

दुनिया में जिन्होंने भी कुछ पाया उन्होंने ही तो पाया जो थोबड़ा लटकाए घूमते थे।

ना आसमान टूट रहा है, ना तुम्हारे थामें थमेगा, जो हो रहा है सो हो ही रहा है। तुम मौज करो काहे कि गंभीरता? तुम क्या करके दिखा लोगे? और जो सबसे बढ़िया होता है वो खेल-खेल में होता है। बड़ी खोजें, बड़ी उपलब्धियां ये सब खेल-खेल में हुए हैं। ये उन लोगों के काम थे जो जीवन में मौज़ लेते थे। जिन्होंने मस्ती को पाया था। ये उनके काम नहीं थे जो गधे की तरह लगे हुए है। पर तुम्हें ये लगता है कि अगर कहीं निर्भार हो गए, हल्के हो गए तो सब टूट-टाट जाएगा। नहीं, कुछ नहीं टूट-टाट जाएगा बल्कि जैसा हो रहा है उससे दस गुना बेहतर होने लगेगा। एक बोझिल आदमी जो कुछ भी करता है उसे बोझ मानके हीं करता है, तो उसके करने में कुछ गुणवत्ता नहीं रहती है। उसको करने में कभी कोई खुशी नहीं मिलती है। और जहाँ तुम्हें खुशी नहीं मिल रही वहाँ कितने दिन तक कर पाओगे?

समझ रहे हो बात को?

हम सौ बार गिरे हों कीचड़ में, हम तब भी कीमती हैं।

हमें सौ दुर्गुण पाल रखे हों, हम तब भी कीमती हैं।

हमे पचास असफलताएं मिली हों, हम तब भी कीमती हैं।

और ये बात बिल्कुल पकड़ लो, हम जैसे हैं, हम कीमती हैं।

और जब ये बात पकड़ लोगे तो जिंदगी दूसरे तरीके से खिलती है। उससे कोई ठहराव नही आ जाता, कोई घमंड नही आ जाता। उससे एक नया बहाव आता है, नदी के तरह बहते हो। हल्के होके बिल्कुल, बहे जा रहे हो, और बड़ी दूर की यात्राएं करते हो बिना बोझ के, बिना गंभीर हुए।

तो भूलना नही इस बात को कि हम कीमती हैं वास्तव में।

मन में कभी ये भाव न आये कि हम छोटे हैं, किसी भी तरह की छुद्रता या तुच्छता है हममें। भले हीं तुम्हे दुनिया समाज लाख ये बताए की तू तो कुछ है ही नहीं नालायक! तुम मानना मत।

तुम कहना, हमें पता है!

वो कहेंगे तू इतना खुश किस बात पे है?

सब कुछ ज़ीरो है तेरा। आप कहना, ‘वो कुछ है अंदर और वो अरबों का है’। तो मस्त है मगन हैं, बिना कारण के ही खुश हैं। कोई कारण नही है हम तब भी मस्त हैं। सब कुछ छिन जाए लेकिन तुम्हारी ये आंतरिक खुशी नहीं छिने।

बिल्कुल फटेहाल हो जायो लेकिन फिर भी मुस्कुराते रहो, और बड़ा फायदे का सौदा होगा, अगर फटेहाल हो कर के सदा की मुस्कुराहट मिलती हो, तो अभी करलो ये सौदा।

बिल्कुल अभी करलो।


शब्द-योग सत्र से उद्धरण। स्पष्टता के लिए सम्पादित।

संवाद देखें : आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: गंभीरता क्या होती है?

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