मुक्ति भी नहीं चाहिए

हमने पहले बात करी हुई है की मन को ऐसा कर लो की वो गन्दगी की तरफ आकर्षित ही न हो

इन्द्रियों को उसका काम करने दोइन्द्रियों के होने भर से, कुछ गन्दा कुछ साफ़ नहीं हो जाताइन्द्रियाँ रास्ता हैं, उस रास्ते पर जो चलने वाला है, उसका निर्धारण मन ही करता हैइन्द्रीओं को रास्ता मात्र ही रहने दीजिएइन्द्रियाँ रास्ता मात्र हैं, इसी का अर्थ हैं स्वछेन्द्रियाँ

मन जो देखता है उसमें अर्थ भरना चाहता हैअर्थ न मिले तो बेचैन हो जाता हैनहीं, अर्थ भरने की ज़रूरत ही नहीं है। कोई नाम देने की ज़रूरत ही नहीं है

मुक्ति भी नहीं चाहिएक्योंकि मुक्ति भी तभी चाहिए होगी जब पहले बंधन प्रतीत होंगे

हम जिसको मुक्ति कहते हैं वो सिर्फ बंधन का विपरीत है मन को एक स्तिथि भा नहीं रही तो उसने कह दिया की ये बंधन हैउसके विपरीत की स्तिथि चाहिए तो उसका नाम दे दिया मुक्तिऔर जिसको मुक्ति का नाम दिया है कल उससे भी मुक्ति चाहिएऔर फिर परसों उससे भी मुक्ति चाहिएपरम मुक्ति वही है कि कुछ भी सामने है, उसको कोई नाम दिया ही नहीं गयाबंधन का तो नहीं ही दिया गयामुक्ति का भी नहीं दिया गया

जब तक तुमने ये कहा कि सत्य एक है, तब तक तुम सत्य की कोई न कोई छवि ज़रूर बनाओगे ही बनाओगे

ज्यों ही आपने कह दिया की वो एक है, वैसे ही आप संसार में, कण-कण में, रचना तो देख पाएँगे रचयिता नहीं देख पाएँगेक्योंकि रचयिता तो ‘एक’ ही है न

ब्रह्म का अर्थ ही है फैलाव

उसका सिर अहंकार के भोज से मुक्त रहेगाजिसने शून्य कह दिया वो हल्का हो जाएगा, बिलकुल हल्का हो जाएगा

मन को बचे रहने के लिए हमेशा दुसरे की ज़रुरत होती है, पराए की ज़रुरत होती हैजब मन कुछ भी बहार न छोड़े, कुछ भी पराया ही न छोड़े, तब भी मन को विगलित होना होता है

तुम प्राथना भी करते हो तो उसको वास्तु बना देते हो, मत करो प्राथना



पूरा लेख पढ़ें: आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर: सत्य-न एक, न अनेक

 

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