मन के मते न चालिए || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2015)

मन के मते न चालिए

प्रश्न: आचार्य जी, मेरे कुछ मित्र ऐसा कहते हैं कि वो अपने मन अनुसार चलते हैं। उनका मन करता है कक्षा में आने का, तो वो कक्षा में आते हैं, और मन नहीं करता है, तो नहीं आते हैं।  तो क्या अपने मन के अनुसार चलना ठीक है?

आचार्य प्रशांत: बेटा, दो तरह की ग़ुलामी होती हैं, ध्यान से समझना इस बात को। ध्यान से। दो तरह की ग़ुलामी होती हैं।

एक ग़ुलामी होती है, बड़ी सीधी। वो ये होती है कि कोई तुमसे कहे कि – “चलो ऐसा करो”।

“चलो, ऐसा करो” –  ये ग़ुलामी मुझे साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है, कि मुझे कहा गया तो मैंने किया। पर ये ग़ुलामी बहुत दिनों तक चलेगी नहीं। क्यों? क्योंकि दिख रही है साफ़-साफ़, कि कोई मुझ पर हावी हो रहा है। तो तुम्हें बुरा लगेगा, और तुम बचकर चले जाओगे।

एक दूसरे तरह की ग़ुलामी होती है। ऐसे समझ लो कि, एक ग़ुलामी यह है कि मैं एक सॉफ्ट-ड्रिंक(पेयजल) बनाता हूँ। मैं एक सॉफ्ट-ड्रिंक मैन्युफैक्चरर हूँ, और मुझे उस ड्रिंक का उपभोग बढ़ाना है। तो मैं एक ये तरीका इस्तेमाल कर सकता हूँ, कि मैं तुम्हें आदेश दूँ, और कहूँ कि – “चलो, ये सॉफ्ट-ड्रिंक पियो”। पर ये तरीका मेरे लिए बहुत उपयोगी सिद्ध नहीं होगा। क्यों? क्योंकि कोई भी चाहता नहीं है गुलाम होना।

और ख़बर फ़ैलेगी, लोग बचने लगेंगे, मेरे सामने नहीं आएंगे। या कह देंगे कि, “हम पी लेंगे,” और पीयेंगे नहीं। यही सब होगा !

अगर मैं ज़रा-सा चालाक हूँ, तो मैं एक दूसरी विधि अपनाऊँगा। मैं ये नहीं बोलूँगा तुमसे कि चलो ये सॉफ्ट-ड्रिंक पियो। मैं तुम्हारे मन में एक चिप फिट कर दूँगा, और उस में लिखा होगा, “सॉफ्ट ड्रिंक पियो”। और फिर तुम ख़ुद बोलोगे, “मेरा मन है सॉफ्ट ड्रिंक पीने का, मैं पी रहा हूँ”। और अब अगर कोई तुमसे आकर कहेगा भी कि, “ये ग़ुलामी है,” तो तुम कहोगे, “नहीं, ये ग़ुलामी नहीं है। मेरा मन कर रहा है। और तुम मेरे दुश्मन हो, अगर तुम मुझे रोक रहे हो, मेरे मन की बात करने से”।

बात समझ रहे हो?

ये जो पूरा तर्क होता है न कि – मुझे अपने मन पर चलना है, मुझे अपने मन पर चलना है, उनसे पूछो, “तुम्हारा मन, तुम्हारा है क्या?” तुम्हारा मन बहुत तरीके से, दूसरों के प्रभुत्व में है। पहली ग़ुलामी से बचना आसान है, दूसरी ग़ुलामी गहरी होती है। दूसरों की ग़ुलामी से बच लोगे, अपने मन की ग़ुलामी से बचना मुश्क़िल है।

और दुनिया इसी झांसे में फंसी हुई है। जिसको देखो, वो यही तो कह रहा है, “भई देखो, मेरा मन है कि मैं ये खाऊँ”। तुम्हारा मन? वाकई? “मेरा मन है कि मैं ये खरीदूँ”। क्या वाकई ये तुम्हारा मन है?

“मेरा मन है कि मैं पढ़ूँ, मेरा मन है कि मैं न पढ़ूँ”। वाकई तुम्हारा मन है? तुम्हें दिखाई भी नहीं दे रहा कि तुम्हारे मन पर किसी और का कब्ज़ा है।

कभी भी इस तर्क को महत्त्व मत देना कि – भई, अपनी-अपनी मर्ज़ी होती है। अपनी मर्ज़ी, ‘अपनी’ होती ही नहीं। लाखों में कोई एक होता है, जिसकी अपनी मर्ज़ी होती है। बाक़ियों की मर्ज़ी क्या होती है?

श्रोता: ग़ुलामी।

आचार्य जी: और मूर्खता ये है कि हमें ये पता भी नहीं होता है कि जिसको मैं अपनी मर्ज़ी कह रहा हूँ, वो मेरी मर्ज़ी है ही नहीं। लेकिन हमें बड़ा गर्व महसूस होता है, ये कहने में कि – “मैं तो अपनी मर्ज़ी पर चलता हूँ”। और अगर कोई रोके उस मर्ज़ी को, तो हम कहेंगे, “तुम मेरे साथ ग़लत कर रहे हो। तुम मेरी इंडिवीडुअलिटी(वैयक्तिकता) में बाधा डाल रहे हो। तुम मेरी स्वतंत्रता में बाधा डाल रहे हो। हमें हक़ है अपने अनुसार करने का। जनतंत्र है, हम अपनी मर्ज़ी से वोट डालेंगे”। और आपको समझ में आता, कि लोगों के वोट उनकी समझ, उनके ऊपर प्रभाव हैं, उससे पड़ते हैं।

तुम किसी गाँव में चले जाओ। अगर कोई संयुक्त परिवार होगा, जिसमें छः औरतें होंगी, वो छः औरतें वहीं वोट डालेंगीं जहाँ उनको उनके पतिदेव ने बता दिया होगा, या पिताजी ने बता दिया होगा कि – जाकर भैंस पर जाकर मोहर लगाना। अगर अब वो कहे कि – “मेरी मर्ज़ी थी भैंस पर मोहर लगाना,” तो उसमें तुम्हारी मर्ज़ी थी कहाँ? तुम्हारे जीवन में कुछ भी ऐसा है कहाँ, जो वाकई तुम्हारी मर्ज़ी से निकला हो। कुछ भी है क्या?

हाँ, क्योंकि आत्म-अवलोकन ज़रा नहीं है, आत्म-ज्ञान ज़रा भी नहीं है, अपनी ज़िंदगी को कभी ध्यान से देखा ही नहीं, तो तुम्हें ये पता भी नहीं है कि, ‘मेरी मर्ज़ी’ जैसा कुछ है ही नहीं।

कुछ भी नहीं है तुम्हारी मर्ज़ी का।

ये तो ऐसा ही है कि किसी उपकरण पर कुछ गीत लिख दिए गए हों, और कोई उसे बजाकर बोले, “ये तो मैं गा रही हूँ”। कभी दुःखभरा गाना आ रहा है, कभी खुशी भरा गाना आ रहा है, कभी प्रेम-गीत आ रहा है, कभी देश-भक्ति का गाना आ रहा है।

और देभक्ति का गाना सुनकर कोई कहे, “मेरी मर्ज़ी है, मेरा देश है”। या प्रेमगीत सुनकर कोई कहे, “मेरी मर्ज़ी है, मेरा प्रेम है”। अरे, ये देशभक्ति या प्रेम नहीं है, प्रोग्रामिंग कर दी गई है। लो, अभी साफ़ कर देते हैं।

(हँसी)

आ रही है बात समझ में?

संवाद देखें :  मन के मते न चालिए || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2015)

आचार्य प्रशांत जी की पुस्तकें व अन्य बोध-सामग्री देखने के लिए:

http://studiozero.prashantadvait.com/

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